यही जीवन है.........!
यही जीवन है मैं दीपक निरंतर जल रहा हूं, दूर करता हूँ अँधेरा , सुबह होगी मैं मिटूंगा , ख़ाक में मिल जाऊंगा । सूर्य के उजाले के आगे, मैं कहां टिक पाऊंगा। यही मेरा जीवन है। दूसरों की खातिर,खुद मिट जाना, कुछ भी पाने की चाह किए बगैर, हर पल जलना, अंधेरा दूर करने को। मानव जीवन का चरम और सार्थक रूप मोक्ष है। उसे पाने के लिए व्यक्ति तप या पुरुषार्थ करता है। इसलिए मृत्यु के भय से मुक्त होकर व्यक्ति को अपने जीवन का सर्वोत्तम उपयोग करना चाहिए। जहां पर मै अटकता हूँ तो जिंदगी गम़गीन हो जाती है। हर ओर सन्नाटा सा होता है न कोई आता है न कोई जाता है बस मैं ही ‘अकेला’ चलता चला जा रहा हूं। मंजिलों की दूरी का एहसास है मुझे फिर भी सपनों की दुनिया में खोया सा अपनी धुन में मश़गूल मैं चल रहा हूं। कुछ तो ख़ास है, इस सफ़र में, जिसके पूरे होने का भरोसा, न जाने कहां गुम सा हो गया है, फिर भी एक रा़ग सुन रहा हूं। इस जिंदगी की कठिन डगर पे, मैं ‘अकेला’ चल रहा हूं। कभी यादों की छाँव से खेले कभी पेड़ों से शीतलता का मज़ा लो,तो कभी सूरज में आंखे डालो कभी अपनों को गले लगा लो, कभी संभालो अपने पागल दिल को तो कभी गगन मैं दूर...