किसी किसी रोज यूहीं बैठे बैठे हुक सी उठती हैं दिल में
किसी किसी रोज यूहीं बैठे बैठे हुक सी उठती हैं दिल में
बेतहाशा बेतमाशा फूट फूट कर रोने की।
ना कोई शख्स जहन में होता हैं,
ना दुख दर्द तकलीफ कोई,
बस एक बेतुकी सी हठ सब कुछ छोड़ने की,
शरीर मानो सारा शुन्न सा हो गया हो,
कोई शख्स भीतर अपने ही दफन हो गया हो,
कानों में बेतहाशा शोर के बीच गूंजते सन्नाटे,
जैसे कोई अपनी ही चीखों से बहरा हो गया हो,
जमाने में जाने ये कैसी रिवायते हैं,
हर किसी को बस खुशी की चाहते हैं।
ना खुशी, ना सुकून की है कोई तलब मुझे,
कोई तो बीमारी बहुत अलग हैं मुझे।
Comments
Post a Comment